Thursday 15 March 2007

निज भाषा (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) रिविजिटेड 2007

अंग्रेजी उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन अंग्रेजी ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।1।।

निज भाषा पढ़ के जदपि, सब गुन होत प्रबीन।
पै अंग्रेजी ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।2।।

उन्नति पूरी है तबहि, जब ग्लोबल उन्नति होय।
निज देश उन्नति किए, रहत मूढ़ सब कोय।।3।।

अंग्रेजी उन्नति बिना, कबहुँ न ह्वै है सोय।
लाख उपाय अनेक यों, भले करो किन कोय।।4।।

इक भाषा, इक जीव, इक, मति सब घर के लोग।
तबै बनत है सबन सो, मिटत मूढ़ता सोग।।5।।

और एक अति लाभ यह, या में प्रकट लखात।
अंग्रेजी में कीजिए जो विद्या की बात।।6।।

तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनौ को कोय।
यह गुन भाषा और महँ, कबहूँ नाहीं होय।।7।।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
पश्चिम से ही ले करहु, अंग्रेजी माहिं प्रचार।।8।।

भारत में सब भिन्न अति, ताहि सों उत्पात।
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।।9।।

सब मिलि वासों छाँड़िकै, दूजे और उपाय।
उन्नति ईंग्लिस की करहु, अहौ भ्रातगन आय।।10।।

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