Thursday 15 March 2007

हिंदी के नाम पर पेंपियाने वाले मेंढक

नॉलेज कमीशन के मुखिया सैम पित्रोदा और फिर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल टी राजेश्वर द्वारा भी कक्षा एक से ही अंग्रेजी पढ़ाने का सुझाव दिए जाने पर जिन हिंदी प्रेमियों(?) ने हाय-तौबा मचाई वह या तो भावनात्मक भाषायी राजनीति के शिकार हैं या फिर उस राजनीति का हिस्सा. मतलब यह कि या तो वे हमेशा से इस देश में भाषा के आधार पर एक बड़े हिस्से को ज्ञान और सत्ता के वास्तविक पहुँच से दूर रखने के षड्यंत्र में भागीदार हैं या फिर इस षड्यंत्र को न समझ पाने की कूपमंडूकता के शिकार हैं.

हिंदी के नाम पर जोर-शोर से पेंपियाने वाले लोग और अपने आप को हिंदी के उद्धारक बताने वाले लोग इस भाषा का तो अहित करते ही आए हैं, उन्होंने इस देश के एक बहुत बड़े मानव संसाधन को भी उनके उस अधिकार से वंचित रखा है जिसको हासिल कर वे अंग्रेजी भाषा को हमेशा से वरीयता देने वाली इस व्यवस्था में अपने लिए बेहतर और सम्मानजनक स्थिति बना सकते थे.

हिंदी की महिमा पर संपादकीय लिखने वाले संपादक अपने अख़बार में नौकरी देने से पहले अपने चपरासी के भी अंग्रेजी ज्ञान की परीक्षा लेना नहीं भूलते होंगे. जरा ग़ौर से नज़र डालें तो हिंदी अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं से लेकर रेडियो और टीवी समाचार चैनलों तक में अंग्रेजी में पढ़े-लिखे लोग ही आपको निर्णायक स्थानों पर बैठे नज़र आएंगे. उनके लिए हिंदी का बस कामचलाऊ ज्ञान होना ज़रूरी है.

हिंदी चैनलों के भीतर तो आपस की बातचीत तक अंग्रेजी में होती है और जिसकी हिंदी जितनी खराब हो वह उसकी नज़र में उतने सम्मान की बात होती है. और कुछ नहीं आया तो फादर कामिल बुल्के की प्राणदायिनी डिक्शनरी तो है ही. यह एक फैशन की तरह से हो गया है. हाँ, कई लोग इसके अपवाद भी हैं.

इन अपवादस्वरूप लोगों को देखकर राहत होती है और यह रोशनी भी मिलती है कि अंग्रेजी का ज्ञान और अंग्रेजी मानसिकता दो अलग-अलग चीजे हैं. आप मानें या न माने अंग्रेजी वैश्विक ज्ञान-विज्ञान की भाषा है और हमारे देश के भीतर शक्ति-संरचना में एक खास वर्ग की भाषा भी.

कथित दूसरी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की तरह इस मामले में लोकतांत्रिक होने से यह वर्ग हमेशा कतराता रहा है. इसके लिए हिंदी की रोटी सेंकनेवाले चंद लोगों की आड़ भी उन्हें मिल ही जाती है.

हिंदी के उद्धारक जरा नज़र दौड़ा कर देखें तो पाएंगे कि हिंदी भाषा और साहित्य में आजीवन अपना योगदान देनेवाले लोग अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग ही थे. और हाँ, ज़रा अपनी गिरेबान में झाँक कर तो देखें तो उनके अपने बच्चे तो अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में ही पढ़ते हैं. इसलिए वे अपनी इस दोगलापनी से बाज़ आएँ. गाल बजाने की बजाए यदि वे अपनी भाषा को जापानी, फ्रेंच या जर्मन की तरह वैज्ञानिक बनाने का प्रयास करते तो आज यह नौबत नहीं होती.

किसी भी भाषा का ज्ञान व्यर्थ नहीं होता. और हाँ, मैकाले के मानसपुत्र अभी भी तुम्हें कामचलाऊ अंग्रेजी सिखाकर तुम्हें क्लर्क ही बनाते रहेंगे और जिंदगी भर तुम इनकी अंग्रेजी से ख़ौफ खाकर इन्हें कोसते हुए इनके तलवे चाटते रहोगे. अपनी मातृभाषा से प्रेम करो और इसे समृद्ध करो लेकिन इसकी पूँछ पकड़ कर बैतरनी पार करने के चक्कर में मिथ्या चेतना के भँवर में रखने वाली राजनीति का शिकार मत बनो.

निज भाषा (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) रिविजिटेड 2007

अंग्रेजी उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन अंग्रेजी ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।1।।

निज भाषा पढ़ के जदपि, सब गुन होत प्रबीन।
पै अंग्रेजी ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।2।।

उन्नति पूरी है तबहि, जब ग्लोबल उन्नति होय।
निज देश उन्नति किए, रहत मूढ़ सब कोय।।3।।

अंग्रेजी उन्नति बिना, कबहुँ न ह्वै है सोय।
लाख उपाय अनेक यों, भले करो किन कोय।।4।।

इक भाषा, इक जीव, इक, मति सब घर के लोग।
तबै बनत है सबन सो, मिटत मूढ़ता सोग।।5।।

और एक अति लाभ यह, या में प्रकट लखात।
अंग्रेजी में कीजिए जो विद्या की बात।।6।।

तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनौ को कोय।
यह गुन भाषा और महँ, कबहूँ नाहीं होय।।7।।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
पश्चिम से ही ले करहु, अंग्रेजी माहिं प्रचार।।8।।

भारत में सब भिन्न अति, ताहि सों उत्पात।
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।।9।।

सब मिलि वासों छाँड़िकै, दूजे और उपाय।
उन्नति ईंग्लिस की करहु, अहौ भ्रातगन आय।।10।।

Tuesday 13 March 2007

सागरिका घोष: माइ अनसूटेबल एंड अनअटेनेबल क्रश

सागरिका घोष को मैंने बहुत देर से जानना शुरु किया. सीएनएन-आइबीएन पर बुद्धदेव भट्टाचार्य का इंटरव्यू करते हुए इस बोल्ड एंड ब्यूटीफूल महिला का नाम मैंने अपने मित्र से पूछा था. सागरिका घोष! किए, अहाँ नै चिन्है छियै? मैथिली में उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी. खैर, इस महिला में कुछ था जिसके चलते हमने अपने कम्प्यूटर में लगे टीवी कार्ड के जरिए उनकी तस्वीर कैप्चर कर ली थी. एक चोरमना किशोरवय बिहारी की तरह मैं वह उस तस्वीर को जब-तब देखा करता.

मेरे अध्यवसायी मित्र हिन्दुस्तानी लेखकों के अंग्रेजी उपन्यासों के शौकीन हैं और हाल में उन्हें एक उपन्यास हाथ लगी. नाम था- ‘दी जिन ड्रिंकर्स’. लेखक- सागरिका घोष. अरे! ये तो वही सागरिका घोष हैं! फ्लैप पर बिना स्ट्रोक किए पासपोर्ट साईज तस्वीर को देखकर मैंने कहा था.

दी जिन ड्रिंकर्स:वुड-बी सोशलाइटों का अपना, आधी रात का सपना

सागरिका का यह उपन्यास कई मायनों में दिलचस्प और महत्वपूर्ण है। मित्र ने जहाँ इस उपन्यास के तारीफों की पुल बाँधी वहीं कई सीमाएँ भी गिनाईं. एक दफ़ा गुस्से में यह तक कहा कि भई सागरिका खुद ऑक्सफोर्ड... नहीं.. नहीं.. ऑक्सफर्ड में पढ़ी हैं और उन्हें कुछ लिखना था सो उन्होंने लिखकर अपनी छुट्टी छुड़ाई.

लेकिन ऑक्सफोर्ड या ऑक्सफर्ड(??) के उच्चारण संबंधी वर्गभेदी चारित्रिक विशेषताओं वाले संदर्भों से आगे भी इस उपन्यास में बहुत कुछ है. उपन्यास भारत और विदेशों के अभिजात्य उच्च शिक्षा संस्थानों की सेमिनारी संस्कृति में होनेवाली मगजमारी को बहुत सलीके से उधेड़ती है. इस व्यवस्था की उपज उनके पात्र इस नए भारत के जटिल ताने-बाने में अपनी भूमिका को परिभाषित करने की छटपटाहट लिए कहाँ-कहाँ फिरते हैं.

वास्तव में, एक छोटे से वर्ग का अपने ही देस में अजनबी होने की त्रासदी इस खास वर्ग को किस कदर उलझा सकती है इसकी झलक यहाँ देखने को मिलती है. यहाँ ओरिएनट्स और ऑक्सिडेंट्स के स्टीरीओटाइप को तोड़ते हुए पूरब के पश्चिम को देखने और पश्चिम द्वारा पूरब को देखने का एक अनूठा नज़रिया पेश किया गया है. क्रिश्टीन और सैम ऐसे ही पात्र हैं. अपने सैंद्धातिक लहजे में जिसे भारतीय बुर्जुआ चिंतक ‘इंडोलोजी’ कहते हैं उसी के माध्यम से इन अकादमिक जुगाली करने वालों पर बड़े ही भोलेपन से कई तंज किए गए हैं. इनके अपने अंतरतल में बसे जन्मजात पूर्वाग्रहों को आईना दिखाने के लिए क्रिश्टीन और सैम का कई बार इस्तेमाल किया गया है. बड़ी ही चालाकी से इकराम गिलक्रिस्ट नाम के प्रसिद्ध लेखक के जरिए इसमें संतुलन बिठाने की कोशिश भी दीख पड़ती है.

उमा, ध्रुव, माधवी जैसे ऑक्सफर्ड रिटर्न, तुक्के से(?) जेएनयू के रास्ते ऑक्सफर्ड तक पहुँचे एक दलित युवक जय प्रकाश, सिविल सर्वेंट शांतनु, एक आदर्श शिक्षक पामेला सेन और अति-क्रांतिकारिता की मध्यवर्गीय खुमारी से ग्रस्त डीके इन सबके सपनों के ताने-बाने में बुनी गई एक कहानी है यह.

सागरिका का यह उपन्यास कई सारी बहसों में एक साथ हस्तक्षेप करने का सायास कवायद जान पड़ता है. आरक्षण के झुनझुने के प्रति एक दलित का अस्वीकार रखने वाला जय प्रकाश सरकारी मुलाजिम बनने की जगह कुछ और बनना चाहता है. वह रिप्रेजेन्टेशन की चालू राजनीतिक धारणा को चुनौती देता नजर आता है. सागरिका ने एक जगह उससे बड़े ही आक्रोश में कहलावाया है- “But what if Sambhai, what if I don’t want to be what the affirmative action laws want me to be? The government in its wisdom has decided, oh these are Untouchables make them study in some government schools and then make them clerks in the government. But what if I don’t want to be a government clerk, Sambhai? What if I don’t want to go from being a slave in society to a slave in the government? What if want food for my brain, not only for my stomach? What about that Sambhai? What if I want to be a poet? Or a composer or an author or an architect? What if I want to be Rabindranath Tagore or Dostoevky? What if want to be Kalidasa or Panini? What if I want to be Milton or Tolstoy? Such things I can’t be Sambhai. I cant be such things.”
…………… “Because”…“knowledge is still not free in India. Knowledge is an…how you say…how Christine says…..instrument of……er, domination…. Knowledge is …Politics… Untouchables are supposed to know …..nothing.”

अंग्रेजी के एक्सेंट से लेकर हिंदी और बांग्ला के भाषिक उलझनों पर भी कई जगह टिप्पणी है. स्वाभाविकता लाने के लिए कई जगह हिंदी के संवादों का भी उनके स्वाभाविक अंदाज में इस्तेमाल किया गया है. हाँ, प्रेम संबंधों को देखने का प्रौढ़ नज़रिया कई बार हावी होता जान पड़ता है लेकिन नयापन है. ‘बैड सेक्स’ से बचने की तरुण तेजपाल की हिदायत का सागरिका ने पूरी तरह पालन किया है हालाँकि कई जगह इसकी गुंजाईश हो सकती थी।

भारत के बुर्जुआ पब्लिक स्फीयर में अपनी अलग पहचान बनाने वाली सागरिका घोष राजदीप सरदेसाई की विवाहिता हैं. टीवी स्क्रीन पर ऊँची आवाज़ में उछल-उछल कर न्यूज पढ़ने वाले उनके पति किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं. 42 वर्षीय सागरिका दो बच्चों की माँ भी हैं.