Wednesday 11 July 2007

एक शर्तिया हिचर-मिचर हटावन जुगाड़

कभी मेरी एक वरिष्ठ सहकर्मी रहीं और पेशे से एक सफल पत्रकार मित्र प्रायः कहा करतीं कि उन्हें बाघ से भी उतना डर नहीं लगता जितना अंग्रेजी से. इसी तरह हमारे कई मेधावी इलाहाबादी मित्र कहते हैं कि वे आईएएस बनते-बनते रह गए क्योंकि ये मुई अंग्रेजी धोखा दे गई.

आज की अनुवाद आधारित हिंदी पत्रकारिता में हमारे काऊ बेल्टिए सब-एडिटर बंधु रोज-ब-रोज इससे जूझते रहते हैं. एक तो हिंदी अखबारों के अंदर इतने कम तन्ख़्वाह पर खटाएंगे फिर कभी कोई हाई फंडे वाली अंग्रेजी समझने में मिश्टेक हो गई तो शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है सो अलग. रंगीन सप्लिमेंटों में ग्लोबल भारत की तस्वीर उकेरने वाले हिंदिया कलमकारों के लिए इस भारत का हिस्सा बन पाना ख़्वाब सरीखा ही रहता है. लेकिन ताज़्ज़ुब की बात यह कि भाषाई एलिएनेशन के शिकार यही मित्र जब हिंदी-अंग्रेजी के मुद्दे पर सोचेंगे तो एक छद्म क्रांतिकारी उद्वेग के साथ इसे एक दूसरी शक्ल दे देंगे.

आप भी कहेंगे कि भई हम भी इसी मुद्दे को खींचे पड़े हैं. लेकिन क्या करें अभी हाल में हिंदी के एक बड़े अख़बार में छपी एक रिपोर्ट पढ़ रहा था. रिपोर्ट के मुताबिक़ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेस्कॉम के प्रमुख रहे किरण कार्णिक की प्रेरणा से 15 से 35 साल तक की उम्र के पाँच लाख लोगों को फर्राटेदार अंग्रेजी सिखाने के लिए एक योजना की शुरुआत की है. इसे अंजाम देने के लिए ‘सोसायटी फॉर क्रिएशन ऑफ अपॉर्च्यूनिटी थ्रू प्रोफिसिएन्सी इन इंग्लिश’ का गठन किया गया है जिसका लक्ष्य चार साल में 35 लाख लोगों को अंग्रेजी बोलने के काबिल बनाना है. कैंब्रिज इएसओएल को मूल्यांकन और सर्टिफिकेट देने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.

रिपोर्ट के आख़िर में दो सवाल ताबड़तोड़ दागे गए हैं. पहला यह कि कार्यकाल के आखिर में मोदी द्वारा ऐसी महत्वाकांक्षी योजना लाने का अर्थ क्या है? और दूसरा जो ज़्यादा सारगर्भित है वह यह कि क्या भाषा सीखने के लिए सरकारी योजना चाहिए?

दुःख होता है. एक बड़े घराने के इस अख़बार पर लगाए जाते रहे काँग्रेसी झुकाव के आरोप के बरक्स पहला सवाल माफ़ करने लायक है. लेकिन दूसरे सवाल का संबंध भाषा, समाज और राज्य (व्यवस्थागत संदर्भ में) की भूमिका से जुड़ा हुआ है.

नरेन्दर भाई मोदी जिस राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं उससे हमारी कोई सहानुभूति नहीं है. योजना के पीछे उनकी किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से अपनी सेहत पर ज़्यादा फर्क नहीं पड़ रहा है. लेकिन यह काम किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री ने किसी की भी प्रेरणा से और किसी भी संकीर्ण राजनीतिक लाभ या व्यापक सामाजिक-आर्थिक यथार्थ के चलते किया हो, हमारे पूरे शैक्षणिक ढाँचे और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के भाषायी फॉर्मूलों को तो आईना दिखाता ही है.

कभी हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान के नारों से पुती दीवालों और कभी स्वयं अंग्रेजी बोल पाने में अक्षम मुख्यमंत्रियों के दुराग्रहों ने इन पर भरोसा करने वाली जनता को जिस अंधेरे में रखा उसका अब भंडाफोड़ हो रहा है. इनमें से कुछ तो टूटी-फूटी बोलने का प्रयास कर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधियों और कई दफा मीडिया के सामने भी हास्यास्पद स्थिति पैदा करते ही रहते हैं लेकिन सराहनीय है कि प्रयास कर रहे हैं.

कुछ तीसदिनिया कैप्सूल खाकर मरे तो कुछ साठदिनिया टॉनिक पीकर, कुछ तो कम्प्लीट फ्लूएंसी लाते-लाते कम्प्लीटली फरस्टिया गए और कुछ तो क्रैश कोर्स के चक्कर में लुटकर क्रैश हो गए....

मातृभाषा का महत्व है. हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में साहित्य और साहित्येतर चीजें रचे जाने, पढ़े जाने, बेचे जाने, बोलने और चिंतन किए जाने के अपने सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक महत्व और आयाम हैं. लेकिन एक विशेष भाषा को वरीयता दी जाने वाली एक विकासशील व्यवस्था में यह क्रांतिकारी सवाल बहुत अधिक समझदारी भरा नहीं है कि इसमें राज्य की भूमिका है या नहीं?

शिक्षा, वह भी राज्य द्वारा प्रदान की जाने वाली शिक्षा के प्रति निषेध के दार्शनिक पहलू से हम सभी कमोबेश परिचित हैं. किसी ने हमारी चिंतन की स्वायत्तता में इसे बाधक बताया तो किसी ने इसे भ्रष्ट और कुंद करने वाला और किसी ने तो इसे हेजिमनी का एक साधन बताया. सबमें कुछ न कुछ सच्चाई का अंश है. लेकिन व्यावहारिक तौर पर इस दी हुई परिस्थिति में हमारे देश में राज्य ही शिक्षा नाम के इस सामान्य हित या ‘कॉमन गुड’ का मनमाना वितरक या ‘आर्बिट्रेरी डिस्ट्रीब्यूटर’ रहा है.

शिक्षा के प्रति कॉन्सटिच्यूशनल मैंडेट और गुणवत्ता बनाम समानता पर भी शिक्षाविद् अखबारों और सेमिनारों में मंथन करते रहे हैं लेकिन अब भी असमानता और विभाजन की नींव शिक्षा के स्तर पर ही पड़ जाती है. रोटी, कपड़ा और मकान के बाद राज्यरूपी इस माइ-बाप ने कल्याण अर्थशास्त्रियों की शब्दावली से इसमें ‘शिक्षा’ और ‘स्वास्थ्य’ शब्द भी जोड़ा है. भूमिका बहुत पहले से रही है. सिविल सोसायटी अपने स्तर पर छिटपुट प्रयास अवश्य करते रहे हैं लेकिन वह ऊँट के मुँह में जीरे के समान है.

बाँकी इसी राज्य के नाक के नीचे तीस और साठ दिनों में हेजिटेशन रिमूवल और फ्लूएन्सी के सपने दिखाने वाले अंग्रेजी के सौदागरों का बाज़ार गर्म है. हर मामले में जुगाड़ पर चलने वाले इस मुल्क में सभी किसी न किसी तरीके से अंग्रेजी सीखने के जुगाड़ में हैं. बाँकी लोग अपने पापी पेट के लिए सिखाने के जुगाड़ में, मसलन शहरों में हर गली और नुक्कड़ पर खुले ईंग्लिश स्पीकिंग कोर्स वाली दुकानें और गाँवों-कस्बों में दोनों ही भाषाओं का अधकचरा ज्ञान पिलाने वाले निजी स्कूल.

भारतीय राज्य जब तक इस पर कोई व्यापक नीति नहीं बनाता तब तक मोदी की भी इस योजना को जुगाड़ ही कहा जाएगा. हाँ, हमारे ये अखबारी बंधु माफ करें तो हम बेअदबी से यह भी अर्ज करने की हिमाक़त करेंगे कि उनके अख़बार में शाया होनेवाले शैक्षिक विज्ञापनों में सर्वाधिक विज्ञापन जुगाड़ु अंग्रेजी के हेजिटेशन रिमूवल के दावेदार संस्थानों के ही होते हैं. लेकिन यह निगोड़ी हेजिटेशन है कि जाती नहीं.. जाती नहीं...