हसद से दिल अगर अफसुर्दा है, गर्मे-तमाशा हो
कि चश्मे-तंग, शायद, कसरते-नज़्ज़ारा से वा हो
(हसद- ईर्ष्या, गर्मे-तमाशा- तमाशे में लीन, चश्मे-तंग- संकीर्ण दृष्टि, कसरते-नज़्ज़ारा- दृश्यों का बाहुल्य)
लगभग डेढ़ सौ साल पहले मिर्ज़ा ग़ालिब ने यह शेर जिस भी संदर्भ में लिखा हो आज वैचारिक प्रतिबद्धताओं और लोकतंत्र की रोशनी में एक माध्यम के रूप में ब्लॉगिंग पर छिड़ी बहस को एक राह दिखाता है।
मोहल्ले पर दीपू राय के उद्गार "हिंदी ब्लॉग का अलगाववाद" में लोकतंत्र और विचारधारा के संबंध में उनकी कुछ पूर्वमान्यताओं पर थोड़ी चर्चा किए जाने की ज़रूरत महसूस होती है। हाल के दिनों में हिंदी चिट्ठाकारों का रवैया क्या विविधता में अराजकता जैसी किसी स्थिति को जन्म दे रहा है या यह वास्तव में हमारी व्यवस्थागत वस्तुस्थिति का ही आईना है इसपर विचार किए जाने की ज़रूरत है।
बेलाग अभिव्यक्ति की आज़ादी और लेखकीय स्वच्छंदता के बीच की महीन रेखा के धुंधले होते जाने से इन चिट्ठों पर चल रहे विमर्श की प्रामाणिकता और उपादेयता अभी तय होनी बाकी है। शुरुआत में लोगों को लगा था कि ऋग्वेद की “सभी उत्तम विचारों को सभी ओर से आने देने” वाली भावना इस माध्यम से साकार रूप ले रही है।
इस वर्ष के प्रारंभ में प्रसिद्ध फिल्मकार शेखर कपूर ने एक अंग्रेजी अख़बार को दिए अपने बयान में कहा था कि ब्लॉगिंग नागरिक समाज के हाथ में इस सदी का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक हथियार साबित होगा जो राष्ट्र-राज्य जैसी संरचना के लिए भी एक बड़ी चुनौती के रूप में पेश आ सकता है। लेकिन हिंदी ब्लॉगिंग के क्षेत्र में जो क्रांतिकारी उभार पिछले दिनों देखने को मिला उनकी कुछ सामान्य प्रवृत्तियों की पड़ताल इस माध्यम के शोधार्थियों के लिए एक दिलचस्प और मौज़ू विषय हो सकता है।
इतने मुद्दे, इतने विचार एक साथ यहाँ आपस में इंटरएक्ट कर रहे हैं कि इनकी सामान्य प्रवृत्तियों की पहचान कर पाना एक दुष्कर कार्य है। यही इसका सबसे मजबूत पक्ष और कमजोर पक्ष भी है। एक नए किस्म की भाषिक शैली तथा प्रवाह और शाब्दिक संरचनाओं के साथ प्रयोग के कुछ अनूठे प्रयास भी यहाँ देखने को मिल रहे हैं जो अध्ययन का एक अलग विषय हो सकता है।
लेखक ने अपने लेख में हिंदी ब्लॉगरों को कई श्रेणी में बाँटा है। बाँटने का आधार शुद्ध रूप से राजनीतिक प्रतिबद्धताएँ हैं लेकिन इनमें मानवीय प्रवृत्तियों का भी घालमेल कर लेखक कुछ दार्शनिक प्रश्नों का हवाला देते नजर आते हैं।
यदि इस झगड़े का तात्कालिक कारण नंदीग्राम के परिप्रेक्ष्य में छिड़ी बहस से उपजा राजनीतिक तनाव है तो मुझे विचारधारा और लोकतंत्र के विषय में लेखक के विचारों से सादर इंकार है।
नंदीग्राम पर पिछले कुछ दिनों से पब्लिक स्फीयर के सभी माध्यमों में जिस तरह की वैचारिक और शाब्दिक लड़ाइयाँ लड़ी जा रही हैं उससे भला हिंदी ब्लॉगर्स कैसे अछूते रहते। एक चर्चित ब्लॉगर के ही शब्दों में कहें तो हिंदी चिट्ठों के अखाड़े में इस मुद्दे पर भी बड़ी शिद्दत से ‘चिट्ठापटक’ जारी है। इसमें कई पक्ष हैं जिनमें तीन-चार पक्ष प्रमुखता से उभरकर सामने आते हैं।
पहला वे जो सीधे-सीधे पूरे वामपंथ के कथित अलोकतांत्रिक चेहरे को उजागर करने का बीड़ा उठाए हुए है(विवेक सत्यमित्रम का लेख “नंदीग्राम नहीं लेफ्ट का मुखौटा है”)।
दूसरा वे जो बुद्धदेव के कथित तानाशाही और नरेन्द्र मोदी के कथित फासीवादी रवैये को एक ही पलड़े में तौल रहे हैं(शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पांडेय का लेख नंदीग्राम:आज का सियाचीन और उस पर आलोक पुराणिक की टिप्पणी- मोदी बुद्धदेव मौसेरे भाई)।
तीसरा वे जो एक हाथ में ‘नंदीग्राम’ और दूसरे हाथ में ‘जय श्री राम’ का झंडा लेकर खड़े हैं यानि ठेठ हिंदुत्ववादी लहज़े में लेनिन और स्टालिन की कब्र कुरेदकर पश्चिम बंगाल पर उनकी आत्माओं का साया बता रहे हैं(तत्वचर्चा नामक ब्लॉग पर मिहिरभोज नाम के ब्लॉगर का लेख “नंदीग्राम के शहीदों को शत्-शत् नमन्” तथा धर्मयुद्ध नामक ब्लॉग पर “नंदीग्राम के हिटलर” शीर्षक से लेख इत्यादि)।
लेकिन एक सबसे सचेत धारा वामपंथ के भीतर से ही निकल कर आने वाली वह धारा है जिसका हमला कथित तौर पर वामपंथ के वास्तविक चरित्र और क्रांति के मार्ग से भटक चुके सीपीएम पर है। इसलिए यह धारा नंदीग्राम की आड़ में सीधे-सीधे वाम आंदोलन पर आक्रमण कर रहे लोगों के षड्यंत्र पर अपना रुख स्पष्ट करने में भी अपनी ऊर्जा झोंके हुए है(मोहल्ले पर नंदीग्राम स्पेशल कवरेज़)।
इस सबके बावज़ूद एक वांछित या अवांछित धारा का प्रतिनिधित्व सिरे से गायब है जो शायद इस सबका जवाब दे पाती। यानि नंदीग्राम के मुद्दे पर पहले ही अपना चेहरा बचाने की स्थिति में आ चुकी सीपीएम का रुख स्पष्ट करने वाला यहाँ कोई नहीं है। लगता है कि या तो वे इस माध्यम पर इतने सक्रिय नहीं हैं या फिर वे इस मुद्दे पर मौन धारण करना ही उचित समझ रहे हैं।
इन सभी धाराओं के प्रतिनिधी ब्लॉग के बीच के वैचारिक टकराव और इनकी अपनी-अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं उपजे अलगाववाद से आहत दीपू राय का हस्तक्षेप वास्तव में लोकतंत्र और विचारधारा के अपने आदर्श चरित्र को लेकर हमारे मन में बसी दुविधाओं और द्वंद्वों का ही प्रतिबिंब हैं।
लोकतंत्र के बारे में जैसा कि हम सभी जानते हैं कि सबसे बड़ी विडंबना यही है कि आधुनिक राज्यों के अस्तित्व में आने के बाद से सभी तरह की शासन व्यवस्थाएँ अपनी लेजिटिमेसी साबित करने के लिए इसे लोकतंत्र का नाम देती रही हैं। हाँ आधुनिक युग में कुछ ऐसे भी उदाहरण देखते को मिले हैं जिन्होंने लोकतंत्र के सर्वोत्कृष्ट व्यवस्था होने की मान्यता को ही ख़ारिज करने की कोशिश की। नाजी और फासी सरकारें इसके लोकप्रिय उदाहरण रहे हैं।
बुर्जुआ डेमोक्रेसी से लेकर पीपुल्स डेमोक्रेसी या न्यू डेमोक्रेसी और लिबरल, सोशल, प्रोसीज़रल, कॉन्सोशिएशनल और यहाँ तक कि गाइडेड डेमोक्रेसी तक डेमोक्रेसी ही डेमोक्रेसी है। लेकिन डेमोक्रेसी के इस चौतरफा भ्रामक विस्तार में समय के साथ-साथ लोगों को समझ में आ रहा है कि डेमोक्रेसी एज़ एन आइडियल और डेमोक्रेसी एज़ ए प्रोसेस में बड़े विरोधाभास मौज़ूद हैं। लोकतंत्र का आदर्श जब-तब हमारे मन में हिलकोरें तो मारता है लेकिन इसकी प्रक्रिया में निहित विसंगतियाँ हमें निराश करने लगती हैं। यदि आप लोकतंत्र के आदर्श स्थिति को लेकर चलेंगे तो आपको इससे बड़ा हास्यास्पद वाक्य शायद ही मिले कि “अमरीका दुनिया का सबसे मजबूत और भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।”
ब्लॉगोस्फीयर में लिखने वाली जनता हमारी प्रचलित सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रिया का ही तो हिस्सा हैं। इनमें कट्टरपंथी भी हो सकते हैं और आदमख़ोर भी। परसाई के शब्दों में कहें तो इनमें मुँह में घास खोंसे कुछ रंगे सियार भी हो सकते हैं। तो इन सब के शाब्दिक प्रहार से बेचैन होकर प्रलाप करना सही नहीं है। और न ही मेरा लोकतंत्र और तेरा लोकतंत्र जैसा उपालंभ अपने मन में पालकर आरोप-प्रत्यारोप से समस्या का हल होना है।
लोकतंत्र के आदर्श में बहस, संवाद या विमर्श का एक अहम् स्थान है। डेलिबरेटिव फॉर्म ऑफ डेमोक्रेसी पर चिंतन जारी है और इसकी प्रक्रियाओं की जटिलताओं से आधुनिक विचारक जूझ रहे हैं। ऐसे में आपको सूचना तकनीक ने एक माध्यम सुझाया है तो आप बहस कीजिए। बिना शाब्दिक हिंसा का सहारा लिए बहस कीजिए। तभी आप किसी रचनात्मक सहमति पर पहुँच सकते हैं। परसुएशन एकमात्र तरीका है। हाँ, एक्सपोज़ करने का अधिकार हम सबों के पास है चाहे इसे व्यंग्य के रूप में पेश करें या नीरस फैक्च्युअल तरीके से लेकिन जहाँ तक तार्किक बहस की गुंजाईश है वहाँ तक लोकतंत्र का विस्तार है।
लेकिन बड़े पैमाने पर परसुएशन के लिए हेजिमनी और मैन्युफैक्चर्ड कंसेंट जैसे सूक्ष्म हथियारों का इस्तेमाल भी व्यवस्थाएँ करती रही हैं। कई मायनों में जन्म से ही हम इसके शिकार रहे हैं और अपने चिंतन में इसे तोड़ने की कोशिश करते रहते हैं। इसलिए यहाँ भी सचेत रहने की जरूरत होगी। चूँकि सबके अपने-अपने पूर्वाग्रह और बायस हो सकते हैं इसलिए आप दूसरों के प्रबोधन की कामना भर कर सकते हैं। और हाँ एक लेवेल प्लेइंग फील्ड में बहस के जरिए उन्हें प्रभावित करने की कोशिश भी कर सकते हैं। उन्हें गरिया कर या बतंगड़ी के जरिए अपनी राय जबरन थोप कर नहीं।
कई ऐसे उदाहरण हैं जहाँ ब्लॉगों ने सामूहिक रूप से अभियान चलाकर इस डिजिटल प्रतिरोध के जरिए कई मुद्दों पर व्यवस्था पर दबाव बनाने की कोशिश की है। सफल भी रहे हैं। लेकिन कुछ के लिए यह बुर्जुआ लोकतंत्र के भीतर एक दबाव समूह का प्रेसर टेक्नीक भी कह कर ख़ारिज भी किया जा सकता है। इसलिए आदर्श रूप में लोकतांत्रिक बहस के लिए ब्लॉग किस तरह एक मीडियम और फोरम का कार्य कर सकते हैं यह आनेवाले समय में ही और स्पष्ट हो पाएगा।
बहरहाल, इस व्यक्तिपरक और कुछ मायनों में अत्यधिक विकेंद्रीकृत और अपेक्षाकृत सरल कहे जा रहे माध्यम को हैंडल करने में आ रही इन पेंचीदगियों से वर्तमान में इसका उपयोगकर्ता शहरी मध्यवर्ग कैसे निपटता है यह देखना दिलचस्प होगा। वैसे, दृश्यों की इस बहुलता में ग़ालिब का यह शेर बड़ा मौज़ू जान पड़ता है।
Thursday 6 December 2007
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